मातोश्री शारदादेवी गिरधारीलालजी लोहिया
गरिमामयी नारी जीवन की अनूठी मिसाल !
अकोला...संसार में आने के बाद अपने सभी कर्तव्यों का पालन बिना किसी शिकायत के पुर्ण करने के
उपरांत यहां से सम्मानजनक, संतोषजनक विदाई लेने में ही अपने व्यक्तित्व की परीक्षा होती हैं.
माँ शारदादेवी लोहिया इन कसौटियों पर शतप्रतिशत खरी उतरी हैं.धैर्य, साहस, दृढता का परिचय
माँ शारदादेवीजी के जीवन में कई बार दिखाई दिया. पति, गिरधारीलाल एवम् पुत्र, प्रमोद के
असामायिक निधन के बाद भी वे डगमगाई नहीं, परिवार का ढाढस बंधाया.इन घटनाओं को
ईश्वरीय विधान के रूप में स्वीकार करके, परिवार को एकता के बंधन में बांधे रखा,बिखेरने से बचा
लिया.माँ शारदादेवीजी का जन्म १५ जनवरी १९४२ को ग्राम बलारा,जिला सिकर, राजस्थान
में एक संस्कारी, सभ्य परिवार में हुआ. पति, गिरधारीलाल की सेवा में अपना जीवन
न्यौछावर करने के साथ साथ, देश के प्रति अपने कर्तव्यों को भी उन्होंने बखूबी निभाया. अपनी
अंतिम सांस तक वह धार्मिक, सामाजिक कार्यों का अनुपालन एव निर्वहन करती रही.
असम में निवास के दौरान सन् १९६५ की लड़ाई में भारत की सेना को अपनी युवा आयु में, सभी
सोने चांदी के गहने, जेवरात तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्रीजी को प्रत्यक्ष दान कर
देना,उनके व्यक्तित्व को अभूतपूर्व उंचाई पर ले गया. युद्ध के पश्चात असम छोडकर महाराष्ट्र के
अकोला में आने के फैसले को माँ ने एक वास्तविक रूप में स्वीकार करके उसे निभाया और सभी
संतानों को उच्च शिक्षा के साथ साथ, उच्च संस्कार भी दिये. त्याग, सेवा,समर्पण का त्रिवेणी
संगम, माँ शारदादेवी के व्यक्तित्व में प्रदर्शित होता हैं. स्व. मातोश्री शारदादेवी सदैव अपने
परिवार, समाज को अग्रसर करने में प्रयत्नशील रहती थी. इन्हीं प्रयासों का नतीजा है कि आज
गिरधारीलाल-शारदादेवी का परिवार समूचे समाज में एक आदर्श परिवार,सम्मानित परिवार
के रूप में खडा हैं. माताजी की सहृदयता,औरों के प्रति सदैव मंगलकामना करने की भावना उन्हें
एक अद्भुत व्यक्तित्व बनाती हैं. आज लोहिया परिवार ने जो मुकाम शिक्षा,आयुर्विज्ञान,वकालत, चार्टर्ड अकाऊंटेंट, इंजीनियरिंग जैसे सम्मानित सेवाओ में पाया है, उसका प्रेरणास्त्रोत-शक्ति, माँ शारदादेवी-गिरधारीलाल लोहिया के अविरत प्रयास है. इन्हीं के
पदचिन्हों पर चलकर लोहिया परिवार आगे बढा हैं, और भी आगे बढता रहेगा. माँ शारदादेवी
का अपने गरिमापूर्ण जीवनयात्रा का समापन, सभी परिजनों के बीच दि. ३१ जनवरी २०२१ को हो
गया.साथ ही उनका दुखद निधन परिवार को शोकसागर में छोड, सभी परिस्थितियों में आगे
बढ़ने की भी प्रेरणा दे गया.मातोश्री शारदादेवीजी की पावन स्मृति को अर्पण-डॉ. अनिल वामनराव देशमुख
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