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पवित्र कुरान के श्लोकों (आयात) में कमी या ज्यादती नहीं की जा सकती- जियाउद्दीन सिद्दीकी (जनरल सेक्रेटरी वहदत ए इस्लामी हिंद)

पवित्र कुरान के श्लोकों (आयात) में कमी या ज्यादती नहीं की जा सकती- जियाउद्दीन सिद्दीकी
(जनरल सेक्रेटरी वहदत ए इस्लामी हिंद) 
अकोला-पवित्र कुरान ईश्वरीय ग्रंथ है। इसे ना बदला जा सकता है, और ना इसमें कमी व ज्यादती की जा
 सकती है। इसको समझना इसके अनुसार चलना और दूसरों तक इसे पहुंचाना हमारा कर्तव्य है। इससे पहले इसको ईश्वरीय ग्रंथ समझना और इस पर ईमान रखना महत्वपूर्ण और जरूरी है। वसीम रिज़वी जैसे पाखंडीयों के लिए हो सकता है यह मजाक हो लेकिन ईमान वालों की यह आस्था है कि यह ईश्वरीय ग्रंथ है। इस्लाम दुश्मन शक्तियां यही चाहती है जिस तरह वसीम रिजवी ने किया है। पवित्र कुरान के 26 श्लोकों/आयतों को देश की उच्च न्यायालय में चैलेंज करना यह किसी ईमान वाले मुसलमान का कार्य नहीं हो सकता हमें इस्लामी धर्मगुरुओं और शिया धर्मगुरुओं से मिलकर वसीम रिजवी को इस्लाम से खारिज कर देना चाहिए।
बाबरी मस्जिद पर भी वसीम रिजवी की  अभद्र टिप्पणियों का  शिया धर्मगुरुओं ने  विरोध किया था। फिकह जाफरिया में मस्जिद को दूसरी जगह परिवर्तित किया जा सकता है इसके बावजूद वसीम रिजवी जो शिया है इसके विरोध में बोला गया इसका विरोध किया गया। ट्रिपल तलाक के समय भी शिया धर्मगुरुओं ने मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का साथ दिया था जबकि एक समय की तीन तलाक को फिकह जाफरिया में एक ही माना जाता है। सहाबा और सहाबियात (रजी) की शान में अपमान करने वाले को इमाम खामनाई जो के विलायत फिकीही के पद पर है मुसलमान नहीं समझते और सुन्नियों के मत से सहमत है।
    पवित्र कुरान को मुसलमानों के विभिन्न गट, जमातें, तंजीमें, संस्थान और खानकाहे ईश्वरीय ग्रंथ मानते हैं, जो प्रेषित मुहम्मद साहब ﷺ पर अवतरित हुआ है। पवित्र कुरान मात्र मुसलमानों के लिए हि नहीं बल्कि सारी मानव जाति के लिए मार्गदर्शक हैं। इसमें कमी या ज्यादती मुमकिन ही नहीं है। पवित्र कुरान जिस प्रकार प्रेषित मुहम्मद साहब ﷺ पर अवतरित हुआ था आज भी बिना किसी बदलाव के वैसा ही है, इसे किसी भी हाल में बदला नहीं जा सकता।
   मुसलमान शिया धर्मगुरुओं से अनुरोध करें कि पाखंडी वसीम रिजवी को इस्लाम से बाहर का रास्ता दिखाएं। उच्च न्यायालय को यह अवगत कराएं कि कुरान पर कोई फैसला करना यह न्याय प्रणाली का हिस्सा नहीं है। अगर उच्च न्यायालय वसीम रिजवी की याचिका को स्वीकार कर लेता है तो यह मान लेना चाहिए की वर्तमान सरकार और न्यायालय इन दोनों की विचारधारा में कोई फर्क नहीं है और मुसलमानों इस्लाम और इस्लामी पहचान से इन्हें कितनी घृणा है और आने वाले समय में इनकी पॉलिसिया क्या हो सकती है। मेरे ख्याल में खुद पवित्र कुरान सरकारों, न्यायालय और बुद्धिजीवियों के लिए मार्गदर्शक बनने जा रहा है और आने वाले समय में इसके अनुसार ही कार्यप्रणाली विकसित किए जाने का अनुमान है। ऐसे विचार जियाउद्दीन सिद्दीकी जनरल सेक्रेटरी वहदत ए इस्लामी हिंद  ने व्यक्त किए।
  

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